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Thursday, June 23, 2011

सत्य कहना और सत्य सुनना

'सत्यमेव जयते '
सत्य की जीत निश्चित है
मगर सत्य कहना 
उतना ही मुश्किल है 
सत्य कहने के लिए ,
हिम्मत और होंसला तो चाहिए
 साथ ही 
प्रतिरोध और विरोध के लिए भी
तैयार रहना चाहिए
सत्य कहने से पहले
सत्य सुनने की शक्ती भी 
आवश्यक है
या कहिये सत्य कहने से
सत्य सुनना ज्यादा कठिन होता है
जो सत्य सुन सकता है
वही सत्य कहने का अधिकारी है
सत्य कहना और सुनना
निरंतर परिश्रम या अभ्यास से नहीं आता
मन का निश्छल और दुर्भावना रहित
होना आवश्यक है

सत्य बोलने का अर्थ है 
स्वयं का आवरण हटाने का संघर्ष
23-06-2011
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर"

Wednesday, June 22, 2011

विपत्ती और सब्र

विपत्ती के समय में इंसान विवेक खो देता है ,
स्वभाव में क्रोध और चिडचिडापन आ जाता है.
बेसब्री में सही निर्णय लेना व् उचित व्यवहार 
असंभव हो जाता है.
लोग व्यवहार से खिन्न होते हैं , 
नहीं चाहते हुए भी
समस्याएं सुलझने की बजाए उलझ जाती हैं
जिस तरह मिट्टी युक्त गन्दला पानी
अगर बर्तन में कुछ देर रखा जाए तो
मिट्टी और गंद पैंदे में नीचे बैठ जाती है ,
उसी तरह विपत्ती के समय 
शांत  रहने और सब्र रखने  में ही भलाई है.
धीरे धीरे समस्याएं सुलझने लगेंगी
एक शांत मष्तिष्क ही सही फैसले और 
उचित व्यवहार कर सकता है.
 डा.राजेंद्र तेला, निरंतर
22-06-2011

Monday, April 4, 2011

उद्यम

"उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै:
नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः "


कार्य 
उद्यम से ही सिद्ध होते हैं
मनोरथ मात्र से नहीं 
 सोये हुए शेर के मुख में 
मृग प्रवेश नहीं करते
(हितोपदेश)

शक्ति

जो मनुष्य 
अपनी शक्ति के अनुसार 
बोझ लेकर चलता है 
वह किसी भी स्थान पर 
गिरता नहीं है 
और न दुर्गम रास्तों में 
विनष्ट ही होता है
- मृच्छकटिक

लगन

लगन  
और 
 योग्यता  
एक साथ मिलें तो
निश्चय ही
एक अद्वितीय  
रचना का  
जन्म होता है
- मुक्ता

संतोष

संतोष का  
वृक्ष कड़वा है  
लेकिन
इस पर लगने वाला 
 फल मीठा होता है
- स्वामी शिवानंद